Power of God: Shree Krishna Arjuna Great Story

इश्वर की शक्ति(Power of God), इश्वर से बड़ा न कोई, इस्वर की लीला अपरम्पार, इसी से सम्बन्धित भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन से सम्बन्धित mahabharat की यह छोटी सी story हे.

Power of God- Small Story of Bhagwan Shree Krishna and Arjuna

power of god

Image:hindutourism

Mahabharat का युद्ध चल रहा था, भगवान श्री कृष्ण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के सारथि थे.

अर्जुन और महान योद्धा कर्ण के बिच युद्ध चल रहा था,जैसे ही अर्जुन का बाण छुटता कर्ण का रथ काफी पीछे हट जाता और जब कर्ण का तीर छुटता तब अर्जुन का रथ सिर्फ सात चरण पीछे हटता.

तब…

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन की प्रसंसा करने के बजाय हर बार “कर्ण के लिए कहते”, वाह “कितना वीर पुरुष हे, यह कर्ण”,जो हमारे रथ को सात चरण पीछे हटा देता हे.

भगवान Shree Krishna की यह बाते सुनकर अर्जुन काफी परेशान हो गए और न सहा जाए न रहा जाए की स्थिति आकर पूछ बैठे.

हे वासुदेव यह पक्षपात क्यों?

मेरे पराक्रम पर आप कोई टिप्पणी नहीं देते और हमारे रथ को केवल 7 चरण पीछे खदेड़ने वाले कर्ण के लिए आप हर बार वाह वाह करते हे?

भगवान् Shree Krishna बोले, पार्थ, तुमको पता नहीं हे, तुम्हारे रथ पर Mahaveer Hanuman और स्वयम में बिराजमान हु, यदि हम दोनों नहीं होते तो तुम्हारे रथ का अभीतक अस्तित्व भी नहीं होता, हमारे दोनों के होते हुए यह रथ को केवल 7 चरण पीछे धकेलना वह कर्ण के महा बलवान होने का संकेत हे.

भगवान श्री कृष्ण की यह बात सुनकर अर्जुन अपने व्यंग पर संकोच करने लगे, यह सत्य को अर्जुन अच्छे तरीके से तब समजे जब युद्ध समाप्त हुआ.

हरेक दिन जब अर्जुन युद्ध से वापिस लोटते तब भगवान श्री कृष्ण रथ में से पहले उतरते और अपना सारथि धर्म निभाते और अर्जुन को पीछे उतारते लेकिन युद्ध के अंतिम दिन रथ मे से उतरने से पहले भगवान् ने कहा “अर्जुन आप पहले रथ मे से उतरकर दूर खड़े रहे”,उनके पश्चात जैसे ही भगवान् श्री कृष्ण रथ में से उतरे,उनके साथ ही रथ जलकर राख हो गया, यह देखकर अर्जुन आश्चर्यचकित हो गए,तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा,“पार्थ तुम्हारा रथ तो कब का जलकर भष्म हो गया था”.

*भीष्म 

*कृपाचार्य

*द्रोणाचार्य

और 

*कर्ण  

के दिव्याश्त्रो से रथ नष्ट हो चूका था, मेरे संकल्प ने उसे युद्ध की समाप्ति तक जीवित रखा था.

अपनी श्रेष्ठा के मद में खोये हुए अर्जुन का अभिमान अब चकनाचूर हो चूका था, अपना सर्वस्व त्यागकर वह भगवान के चरणों में नतमस्तक हो गया.

अब वह अभिमान का मिथ्या भार उतारकर बहुत ही सरल महसूस कर रहा था, गीता श्रवण में इससे विशेस क्या उपदेश हो सकता हे,“सबकुछ कर्ताहर्ता भगवान ही हे,हम तो केवल एक कठपुतली हे”.

काश हमारे अन्दर का अर्जुन भी यह समज जाए, अभिमान life में सिर्फ कष्ट ही देता हे.

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