Proof of God: स्वामी विवेकानंद के जीवन की दो प्रेरक कहानी

ऐसा कोई शख्स नहीं होगा जो स्वामी विवेकानंद को नहीं जानता होगा इसलिए मुझे यहाँ उनका परिचय देने की जरुरत नहीं हे, हम यहाँ बात कर रहे हे proof of god की जो हम उनके जीवन के दो प्रेरक प्रसंग से समजेंगे.

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Proof of God: भगवान की उपस्थिति

यह बात हे सन 1881 की, एक professor ने class में उनके students को एक प्रश्न किया.

यह दुनिया में जो हम देख रहे हे वह किसने बनाया हे?

क्या परम कृपालु परमात्मा ने इसकी रचना की हे?

Student ने जवाब दिया: हां सर

Professor: तो फिर शैतान को किसने बनाया हे?

क्या शैतान को भी परमात्मा ने बनाया हे?

Student एकदम शांत हो गया और उसके बाद उसने प्रोफेसर को एक विनंती की, सर क्या में आपको एक प्रश्न पूछ सकता हु?

प्रोफेसर ने कहा, हा बिलकुल.

Student: क्या ठंडी जैसा कुछ होता हे?

Professor: बिलकुल होता हे.

Student: क्षमा चाहूँगा सर, आपका जवाब गलत हे, ठंडी लगना वह गर्मी की अनुपस्थित का परिणाम हे.

Student ने Professor को दूसरा सवाल किया.

क्या अँधेरे का अस्तित्व होता हे?

Professor: हां बिलकुल, क्यों नहीं?

Student: सर, इस बार भी आप गलत हे, सहीमे अँधेरे जैसी कोई चीज हे ही नहीं, सहीमें तो अँधेरा रौशनी की अनुपस्थिति हे, जैसे ही रौशनी आएगी अँधेरा गायब हो जाएगा.

सर, हम हररोज प्रकाश और गर्मी का अभ्यास करते हे लेकिन ठंडी और अँधेरे का नहीं करते, उसी तरह शैतान की कोई उपस्थिति नहीं हे वह तो प्रेम, विस्वास और आस्था की अनुपस्थित हे, जिसको इश्वर के प्रति आस्था और श्रद्धा नही हे उसको ही शैतान का अनुभव होता हे.

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Proof of God: Story 2

एक दिन Swami Vivekananda दक्षिणेश्वर मन्दिर के बाहर बैठे हुए थे और वह विचारमग्न थे उस वक्त एक व्यक्ति मन्दिर से बाहर निकला, उसने स्वामी जी को प्रणाम किया और पूछा, भगवान के दर्शन कैसे कर सकते हे?

उसका यह सवाल सुनकर स्वामी जी ने उससे पूछा, अभी तुम कहा से आ रहे हो?

उसने बताया की वह मन्दिर से प्रभु के दर्शन कर आ रहा हे, फिर तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो की भगवान के दर्शन कैसे करे?

क्या तुमने मन्दिर में माँ काली के दर्शन नही किये?

क्या तुमने उनके केवल एक पत्थर की मूर्ति समजकर दर्शन किये?

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यह सुनकर वह व्यक्ति हक्कापक्का हो गया.

स्वामी जी थोड़ी देर रुके और फिर उसे कहा, दुनिया के हरेक व्यक्ति में भगवान विद्यमान हे, प्रत्येक आत्मा अंतर्निहित परमात्मा हे, बाह्य और अन्तः प्रकृति का नियमन कर अंतनिर्हित ब्रह्मस्वरूप को व्यक्त करना ही जीवन का लक्ष्य हे.

 

 

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