Theology: The True Principle of Karma

Theology: कर्म का सही सिद्धांत- The true principle of karma.

Theology

Mahabharat का युद्ध समाप्त हुआ और भगवान Shree Krishna द्वारिका वापिस लौटे, महारानी रुक्मणि उनके पास आई और उनसे पूछा…

हे माधव: युद्ध में गुरु द्रोण, भीष्म पितामह जैसे ज्ञानी, पुण्यशाली और महान योद्धाओ को छल-कपट से मारा गया उसमे आप सहभागी क्यों बने? उनकी महानता और कर्तव्यनिष्ठा का कोई मूल्य नहीं हे, यह पाप आपने क्यों होने दिया?

महारानी रुक्मणि द्वारा पूछे गये इस प्रश्न पर भगवान श्री कृष्ण मौन रहे और केवल मुस्कुराये!

रुक्मणि तस से मस न हुई और लगातार वही प्रश्न पूछती रही…

तब भगवान श्री कृष्ण बोले, हे प्रिये, उन दोनों की महानता और कर्तव्यनिष्ठा के विषय में कोई शंका नहीं हे लेकिन उन दोनों ने अपने जीवन में केवल एक ही ऐसा पाप किया था जिसके कारण उनके पुरे जीवन के अच्छे कर्म धुल गये.

रुक्मणि ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा, कौनसे कर्म?

Shree Krishna: हे देवी, जहा द्रोपदी का चीर हरण हुआ वहा यह दोनों उपस्थित थे, वह दोनों उस घटना को रोकने के लिए सभी तरह से सक्षम थे, लेकिन उन्होंने उसे रोका नहीं और बिना कुछ बोले वहा बैठकर सबकुछ देखते रहे.

Theology of Life: कर्म का सिद्धांत

जो अच्छाई एक नारी का अपमान हो रहा न रोक शके वह किस काम की? उनका यह एक पाप उन दोनों की तमाम महानता और श्रेष्ठता को धोने के लिए-नष्ट करने के लिए पर्याप्त था.

रुक्मणि ने यह सुनकर कहा, यह सच स्वामी लेकिन कर्ण का क्या? उसे क्यों धोखे से मारा गया? वह तो महा दानेश्वर, श्रेष्ठ मित्र और महा पराक्रमी था, उसने अपनी माता कुंती, जिसने अपना पूरा जीवन उसका त्याग किया उसे भी अर्जुन के अलावा किसी पांडव को न मारने का वचन दिया, इंद्र को दान में अपना कवच और कुंडल दे दिया, ऐसे महान दानेस्वरी को कौन से पाप के लिए मारा गया?

Shree Krishna: प्रिये, जब सात सात महारथी के सामने सफलता पूर्वक लड़कर महावीर अभिमन्यु निचे पड़ गया और मृत्यु के एकदम नजदीक था तब उसने असीम आशा के साथ अपने पास खड़े कर्ण के पास पिने का पानी माँगा, उसको पूरी श्रद्धा थी की दुश्मन होने के बावजूद महान दानेश्वरी कर्ण उसे पानी जरुर देगा लेकिन कर्ण ने अपने पास मिठा पानी का झरना होने के बावजूद केवल अपना मित्र दुर्योधन नाराज न हो इस वजह से उसने मरते हुए अभिमन्यु को पानी न दिया और वह बाल योद्धा बिना पानी के प्यासे ही मर गया.

हे रुक्मणि, केवल यह एक ही पाप उसके जीवन के बड़े से बड़े दान-पुन्य को नष्ट करने के लिए पर्याप्त था और काल के चक्र को देखो उसी पानी के झरने में कर्ण के रथ का पैया फसा और वह उसके मृत्यु का कारण बना.

यही हे “कर्म का सिद्धांत”, Principle of Karma, “जैसी करनी वैसी भरनी”, “जैसा बोवोगे वैसा पाओगे”, किसी को किये गये अन्याय का एक ही पल पुरे जीवन की प्रमाणिकता को क्षण में नष्ट कर देता हे, यही हे Theology of Life.

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